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छत्तीसगढ़ की जनजातियाँ — सम्पूर्ण अध्ययन · Chapter 12
जनजातीय नृत्य (2): दोरला, धुरवा, बैगा, कोरकू, उराँव और करमा

जनजातीय नृत्य (2): दोरला, धुरवा, बैगा, कोरकू, उराँव और करमा

इस अध्याय में बस्तर की अन्य जनजातियों (दोरला, धुरवा) और बैगा-गोंड-परधान वर्ग के नृत्यों के साथ करमा, दशहरा और अन्य नृत्यों का विवरण है। पुस्तक के नक्शे में बताया गया है कि नृत्य किन क्षेत्रों से जुड़े हैं: उत्तर में कोरकू (थापड़ी, ढांढल, डंडारी-भतरा), कोरवा (दमनच), उराँव (सरहुल), भारिया (भड़म), कंवर (बार); मध्य-पश्चिम में बैगा-परधान के नृत्य; दक्षिण में मुड़िया, अबूझमाड़िया, धुरवा, माड़िया और दोरला।

परीक्षा में करमा, सैला, बिल्मा, परघौनी और परब जैसे नृत्य सबसे ज्यादा पूछे गए हैं, इसलिए इन्हें तिथि-अवसर-वाद्य के साथ याद करें।

दोरला: पैडुल / पेण्डुल नृत्य

बिंदुविवरण
जनजातिदोरला
वाद्ययंत्रविशेष प्रकार का ढोल
क्षेत्रसुकमा
अवसरविवाह और पर्वों के अवसर पर
वेशभूषापुरुष पंचे, कुसमा, रूमाल; स्त्रियाँ रहके और बट्ट पहनती हैं

धुरवा जनजाति के नृत्य

परब नृत्य धुरवा और परजा का सैन्य नृत्य है। वाद्य अल्गोजा है। इसमें स्त्री-पुरुष सामूहिक रूप से भाग लेते हैं और बीच-बीच में पिरामिड बनाने जैसे करतब दिखाते हैं।

मड़ई नृत्य धुरवा का नृत्य है जो मड़ई मेले और धार्मिक उत्सवों में होता है। युवक-युवतियाँ मोर पंख का गुच्छा रखकर नृत्य करते हैं। जनश्रुति के अनुसार 1910 में बस्तर में महान आंदोलन (भूमकाल विद्रोह) हुआ जिसके नेता शहीद गुण्डाधुर थे, जिन्होंने मड़ई नृत्य की सहायता से जनभावनाओं का प्रसार किया। (यह पुस्तक में जनश्रुति के रूप में लिखा है।)

बिल्मा नृत्य

बिंदुविवरण
जनजातिबैगा और गोंड
अवसरविजयादशमी (दशहरा)
वाद्यमांदर
प्रतिभागीमहिला एवं पुरुष
विशेषएक गाँव के युवक और युवती अलग-अलग समूहों में दूसरे गाँव में नृत्य करने जाते हैं

सैला / डंडा / सैला-रीना नृत्य

बिंदुविवरण
जनजातिगोंड, बैगा एवं परधान
उपनामगिरदा
पद्धतिसैला (नृत्य पद्धति) एवं रीना (गायन पद्धति)
अवसरधान कटाई के पश्चात (दीपावली के समय भी)
शुरुआतशरद पूर्णिमा से
विशेषकेवल पुरुष नर्तक; डांडिया का एक रूप जो सरगुजा क्षेत्र में सर्वप्रमुख है; छड़ी की सहायता से किया जाता है

बस्तर का सैला/डंडा नृत्य: पौष पूर्णिमा के दिन; बस्तर में इसे डंडारास भी कहते हैं; द्रविड़ वर्ग इसे कोलांग नृत्य कहता है; हल्बी, भतरी एवं छत्तीसगढ़ी में डंडार/डंडहार/दादर। बस्तर के भेद: पूस कोलांग, चैत दादर, छेरता। उद्देश्य भीमादेव को प्रसन्न कर अधिक वर्षा की कामना है; भीमादेव को वर्षा/जल का देवता माना जाता है। पुरुषों की टोली छोटे डंडे लेकर एक-दूसरे के डंडे पर मारती और गीत गाती है।

स्रोत की विसंगति: सैला की शुरुआत सरगुजा-वाले विवरण में शरद पूर्णिमा से बताई गई है, जबकि बस्तर के विवरण में पौष पूर्णिमा लिखी है। दोनों क्षेत्रों का अंतर है, इसलिए प्रश्न में क्षेत्र देखकर उत्तर चुनें।

फाग, अटारी, परघौनी, झटपट, ददरिया, दशहरा, खोखड़ा

नृत्यजनजातिविवरण
फागगोंड, बैगाहोली; मांदर व टिमकी; एक या दो व्यक्ति लकड़ी के मुखौटे और लकड़ी की चिड़िया आदि नचाकर मनोरंजन करते हैं
अटारीभूमिया, बैगा, उराँव (बघेलखण्ड क्षेत्र)एक पुरुष के कंधे पर दो व्यक्ति आरूढ़ होकर नृत्य करते हैं
परघौनीबैगा, कोरकूविवाह पर बारात अगवानी के लिए; नगाड़ा और टिमकी; खटिया, सूपा, कंबल आदि से हाथी बनाकर नचाना; हाथी पर समधी को बैठाकर नृत्य-गीत; हाथी के आगे दुल्हन
झटपट नाचबैगादशहरा में
ददरियाबैगाइस दौरान जीवनसाथी का चुनाव किया जाता है
दशहरा नृत्यबैगाउपनाम दशहरा कर्मा; विजयादशमी से शुरू; "जनजाति नृत्यों का प्रवेश द्वार"; बैगा पुरुष अन्य ग्राम जाकर लोगों को करमा नृत्य हेतु प्रेरित करते हैं
खोखड़ाबैगाबैगा जनजाति द्वारा (पृष्ठ पर आगे विवरण नहीं)

करमा नृत्य

पुस्तक इसे "जनजातियों में सर्वाधिक लोकप्रिय नृत्य" कहती है। सम्बद्ध जनजातियाँ: बैगा, उराँव, मुण्डा, कमार, गोंड, कंवर, पण्डो, बिंझवार, बिरहोर। प्रमुख देवी करम सेनी है। यह कृषि परंपरा पर आधारित है। यह सामान्यतः विजयादशमी से आने वाले वर्षा ऋतु के पूर्व तक चलता है और वर्षा काल में नहीं चलता (जबकि सरगुजा क्षेत्र में भादो माह में)। उद्देश्य करमा/कर्म देवता को प्रसन्न करना है। वाद्य मृदंग/मांदर (केंद्रीय वाद्य), टिमकी, झांझ। यह वर्षा ऋतु के अंत और बसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक है। स्त्री-पुरुष दोनों भाग लेते हैं और अर्द्धगोला बनाकर नाचते हैं।

करमा का प्रकारजाति
बैगानी करमाबैगा
माड़ी करमामाड़िया
गोंडी करमागोंड
भूईहारी करमामुड़िया
बिरम एवं देवारी करमादेवार
अन्य प्रकारकलसा, तलवारी, थाड़ी, खल्हा, लहकी, झखर, झुमर करमा

स्रोत में आपत्ति योग्य बिंदु: पहले पृष्ठ की वादय-तालिका में करमा के लिए "मांदर, टिमकी एवं झांझ" और यहाँ "मृदंग/मांदर, टिमकी, झांझ" लिखा है; दोनों आपस में संगत हैं।

उराँव, कोरकू, भतरा, कंवर, कोरवा, भारिया, कोल के नृत्य

जनजातिनृत्यविवरण
उराँवसरहुलसाल वृक्ष में फूल आने पर; मांदर व झांझ
कोरकूथापड़ी, ढांढलथापड़ी बैशाख माह में; पंजा, चिटकोरा, ढोलक, बासुरी
भतरा, कोरकूडंडारीहोली के अवसर पर
कंवरबार नृत्यमनोरंजन के समय
कोरवादमनचसबसे भयानक/खतरनाक नृत्य
भारियाभड़म, सैतमसबसे लंबे समय तक चलने वाला नृत्य
कोलकोलदहकाझांझ व ढोलक

तुलना एवं संबंध

नृत्यजनजातिअवसरवाद्य
बिल्माबैगा, गोंडविजयादशमीमांदर
फागबैगा, गोंडहोलीमांदर व टिमकी
परघौनीबैगा, कोरकूविवाहनगाड़ा व टिमकी
करमाबैगा, उराँव आदिविजयादशमी से वर्षा तकमांदर, टिमकी, झांझ
सरहुलउराँवसाल फूलने परमांदर व झांझ
परबधुरवा, परजा-अलगोजा

याद रखने योग्य बिंदु

  • बिल्मा नृत्य बैगा (और गोंड) का, विजयादशमी पर।
  • सैला-रीना: सैला = नृत्य पद्धति, रीना = गायन पद्धति।
  • सैला केवल पुरुष नर्तकों का, छड़ी से।
  • सैला/डंडा के अनुसार भीमादेव वर्षा/जल के देवता हैं।
  • फाग होली पर, मांदर व टिमकी।
  • परघौनी में हाथी बनाकर बारात की अगवानी।
  • अटारी में एक पुरुष के कंधे पर दो व्यक्ति।
  • करमा सर्वाधिक लोकप्रिय जनजातीय नृत्य, देवी करम सेनी।
  • करमा वर्षा ऋतु के अंत और बसंत के आगमन का प्रतीक।
  • दशहरा नृत्य को जनजाति नृत्यों का प्रवेश द्वार कहा गया।
  • परब नृत्य सैन्य नृत्य, वाद्य अलगोजा।
  • सरहुल उराँव का, साल फूलने पर।
  • थापड़ी कोरकू का, बैशाख माह में।
  • दमनच कोरवा का सबसे खतरनाक नृत्य; भड़म भारिया का सबसे लंबा नृत्य।

स्मरण सूत्र

  • "बिल्मा - बिजयादशमी में बैगा"
  • "थापड़ी-कोरकू, सरहुल-उराँव, दमनच-कोरवा, भड़म-भारिया"
  • "फाग-फागुन-होली, परघौनी-बारात"

परीक्षा में कैसे पूछा जाता है

सबसे ज्यादा प्रश्न सीधे "नृत्य-जनजाति" जोड़ी पर आते हैं (जैसे सरहुल-उराँव, थापड़ी-कोरकू, बिल्मा-बैगा)।

सैला-रीना कब शुरू होता है और किस समूह में प्रचलित है, ऐसे प्रश्न भी आए हैं।

वाद्य और विशेष लक्षण (सैन्य नृत्य, सबसे खतरनाक) वाले प्रश्न कम पर नियमित हैं।

स्वयं जाँचें

  • प्रश्न: परब नृत्य किसका सैन्य नृत्य है? उत्तर: धुरवा और परजा
  • प्रश्न: सैला में रीना का अर्थ? उत्तर: गायन पद्धति
  • प्रश्न: परघौनी किस अवसर पर? उत्तर: विवाह (बारात की अगवानी)
  • प्रश्न: करमा की प्रमुख देवी? उत्तर: करम सेनी
  • प्रश्न: अटारी नृत्य की विशेषता? उत्तर: एक पुरुष के कंधे पर दो व्यक्ति

अभ्यास प्रश्न

  1. बिलमा नृत्य किस जनजाति द्वारा किया जाता है?

    • (A) बैगा
    • (B) दोरला
    • (C) माड़िया
    • (D) मुरिया
  2. सरहुल किस जनजाति का पारम्परिक लोकनृत्य है?

    • (A) उराँव
    • (B) गोण्ड
    • (C) भतरा
    • (D) मुरिया
  3. ‘थापड़ी नृत्य’ इस राज्य के किस जनजाति समुदाय का है ?

    • (A) कोरकु
    • (B) बैगा
    • (C) मुरिया
    • (D) धुरुवा
  4. इस राज्य के गोंड जनजाति का नृत्य ‘सैला-रीना’ का प्रारम्भ कब से होता है?

    • (A) माघ पूर्णिमा
    • (B) सोमवती अमावस्या
    • (C) कार्तिक पूर्णिमा
    • (D) शरद पूर्णिमा

उत्तरमाला एवं व्याख्या

  1. (A) - बिल्मा नृत्य बैगा (और गोंड) करते हैं; दोरला, माड़िया, मुरिया के नृत्य अन्य हैं।
  2. (A) - सरहुल नृत्य उराँव जनजाति का है (साल वृक्ष में फूल आने पर)।
  3. (A) - थापड़ी नृत्य कोरकू जनजाति का है (बैशाख माह में)।
  4. (D) - सैला-रीना नृत्य की शुरुआत शरद पूर्णिमा से बताई गई है।
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