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छत्तीसगढ़ की जनजातियाँ — सम्पूर्ण अध्ययन · Chapter 17
जनजातीय शिल्प, चित्रकला एवं स्मृति स्तंभ

जनजातीय शिल्प, चित्रकला एवं स्मृति स्तंभ

छत्तीसगढ़ के आदिवासी समाज की पहचान केवल नृत्य-गीत से नहीं, बल्कि हाथ के हुनर से भी बनती है। मिट्टी, लकड़ी, पत्ते, बाँस, पत्थर और रेशे जैसी जंगल से मिलने वाली चीज़ों से यहाँ के शिल्पकार खिलौने, बर्तन, मूर्तियाँ, कंघियाँ और सजावटी सामान बनाते हैं। इस अध्याय में हर शिल्प के साथ उसका क्षेत्र, उससे जुड़ी जनजाति, बनाने की विधि और प्रसिद्ध कलाकारों के नाम एक साथ रखे गए हैं।

परीक्षा (छत्तीसगढ़ लोकसेवा आयोग, व्यापम, पटवारी) में सबसे अधिक पूछा जाने वाला प्रारूप जोड़ी मिलाना है: कौन-सी कला - कौन-सा क्षेत्र - कौन-सी जनजाति - कौन-सा कलाकार। इसलिए नीचे की तालिकाओं को बार-बार दोहराएँ। इसी अध्याय में मृतक स्तंभ और स्मृति स्तंभ भी शामिल हैं, क्योंकि ये लकड़ी और पत्थर की जनजातीय कला के साथ-साथ मृत्यु-संस्कार की परंपरा से जुड़े हैं।

मृत्तिका (मिट्टी) शिल्पकला

पुस्तक के अनुसार यह छत्तीसगढ़ की आदिम शिल्पकला है, जिसमें मिट्टी से तरह-तरह के खिलौने, मूर्तियाँ और बर्तन बनाए जाते हैं। यह कला विशेष रूप से बस्तर और सरगुजा क्षेत्र में प्रचलित है। दोनों क्षेत्रों की शैली और नाम अलग-अलग हैं।

बिंदुसरगुजा क्षेत्रबस्तर क्षेत्र
स्थानीय नामरजवार भित्ति शिल्पकला (अंग्रेज़ी में Earthen Sculpture Shilp)अलग नाम नहीं दिया गया; चार प्रमुख केंद्र गिनाए गए हैं
अंचल / केंद्रसरगुजानगरनार; कुम्हारपारा-कोण्डागाँव; नारायणपुर; एड़का
प्रयुक्त सामग्रीसफ़ेद मिट्टी और स्थानीय रंगपृष्ठ पर अलग से सामग्री नहीं दी गई
प्रमुख शिल्पकारसोनाबाई रजवारक्षितरूराम, देवनाथ, शंभू, चन्दन सिंह, वृन्दावन, जगदेव, सहदेव, रोशनलाल

ध्यान दें कि इस कला की कलाकार सोनाबाई रजवार का क्षेत्र सरगुजा का लखनपुर बताया गया है और उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्तकर्ता कहा गया है (आगे की तालिका देखें)।

काष्ठ (लकड़ी) शिल्पकला

छत्तीसगढ़ वन-सम्पदा से समृद्ध राज्य है, इसलिए अनेक जनजातियाँ लकड़ी का काम करती हैं। बस्तर की काष्ठ शिल्पकला को विश्व प्रसिद्ध बताया गया है। इसके उत्कृष्ट उदाहरण हैं: कलात्मक मूर्तियाँ, नृत्य करती हुई मूर्तियाँ, कलात्मक मृतक स्तंभ, गोटुल के खंभे और तीर-धनुष।

  • जनजाति: मुरिया और अबूझमाड़िया; क्षेत्र: बस्तर अंचल।
  • प्रसिद्ध काष्ठ शिल्पकार: अजय मण्डावी (कांकेर) - पुस्तक के अनुसार उन्हें 2023 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया; पंडीराम मण्डावी (नारायणपुर)।
  • चिमनी / दीपक काष्ठ शिल्पकला: क्षेत्र सरगुजा; यह कला मलार जनजाति द्वारा की जाती है। (यहाँ शीर्षक में "काष्ठ" शब्द है, जबकि एक परीक्षा-प्रश्न इसे धातु-कला के रूप में पूछता है; उत्तर दोनों में एक ही है - मलार।)

जनजातियों द्वारा स्थापित काष्ठ स्तंभ

जनजातिस्थापित काष्ठ स्तंभ
माड़ियाअनालगड्या / हनालगट्टा / उर्सकल / कोटोकल (ये सब मृतक स्तंभ हैं)
कोरकूमेघनाथ स्तंभ
मुरियागोटुल स्तंभ
भतरासेमल स्तंभ (होली-डंडारी नृत्य के अवसर पर)
भीलगाथा

तालिका में माड़िया, मुरिया और भतरा के साथ कोरकू और भील भी दिए गए हैं; भील का स्तंभ केवल "गाथा" नाम से छपा है। परीक्षा में "मेघनाथ स्तंभ किससे संबंधित है" जैसा प्रश्न इसी तालिका से बनता है।

स्मृति स्तंभ

स्मृति स्तंभ का आशय उन चिह्नों से है जो अपने पूर्वजों की याद को जीवित रखने के लिए बनाए जाते हैं। ये आमतौर पर लकड़ी, सीमेंट, मिट्टी और पत्थर से बने खंभों या टीलों के रूप में होते हैं। इन पर सामान्यतः नक्काशी, पेंटिंग, खुदाई और आकर्षक चित्र बने होते हैं जो मृतक का शोक, उसके सपने और जीवन-शैली की याद दिलाते हुए मृत्यु के कारणों का विवरण भी दर्शाते हैं। इस स्तंभ के आसपास ही नवाखानी के अवसर पर पूर्वजों के सम्मान और आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध आयोजित किया जाता है।

मृतक स्तंभ (माड़िया जनजाति)

बिंदुविवरण
जनजातिमाड़िया
उपनामगायता पखना
निर्माण1. काष्ठ से निर्मित; 2. पाषाण (पत्थर) से निर्मित
क्षेत्रबस्तर में 10-15 फीट या इससे अधिक ऊँचाई के मृतक स्तंभ मिलते हैं; दंतेवाड़ा क्षेत्र के गामावाड़ा में बड़ी संख्या में विश्व प्रसिद्ध मृतक स्तंभ हैं
नक्काशीइन लकड़ी के स्तंभों पर गोत्र-चिह्न के साथ पशु-पक्षियों की आकृतियाँ उकेरी जाती हैं
वर्तमान स्थितिअब स्तंभों का स्वरूप बदल गया है; इन्हें क्रांकीट (कंक्रीट) से बनाकर उन पर चित्रकारी की जाती है, जो आज भी जनजातीय विशिष्टता और संस्कृति को दर्शाती है

पत्ता शिल्पकला

  • क्षेत्र: मुख्यतः बस्तर और सरगुजा अंचल तथा मध्य छत्तीसगढ़ के वनांचल।
  • जनजाति: शिकारी एवं पारधी।
  • वस्तुएँ: छिन्द के पत्तों से चटाई, झाड़ू, खिलौने, पेन स्टैण्ड और मौर (दूल्हा-दुल्हन के लिए)।
  • बस्तर क्षेत्र में साल (सरई) के पत्तों से दोना-पत्तल आदि बनाए जाते हैं।

कंघी शिल्पकला

क्षेत्र बस्तर संभाग है और जनजातियाँ मुड़िया तथा बंजारा हैं। इसमें लकड़ी से अत्यंत कलात्मक कंघियाँ बनाई जाती हैं। विशेष बात यह है कि बस्तर क्षेत्र में कंघी प्रेम के उपादान (प्रेम-उपहार) के रूप में प्रतिष्ठित है।

प्रस्तर (पत्थर) शिल्पकला

यह भी बस्तर संभाग की कला है और इससे मुड़िया तथा माड़िया जनजातियाँ जुड़ी हैं। इसमें छेनी-हथौड़ा और अन्य उपकरणों से पत्थरों पर चित्र उकेरे जाते हैं। इस शिल्प में बस्तर के चित्रकोट क्षेत्र की विशेष प्रसिद्धि बताई गई है।

बाँस शिल्पकला

यह कला पूरे छत्तीसगढ़ में फैली है। जुड़ी जनजातियाँ हैं: कमार, कंडरा, धनवार, बिरहोर आदि। बनने वाली वस्तुएँ: टुकनी, झउहा, पर्रा, सोफा और सजावटी सामग्री। परीक्षा-सूत्र: "बाँस = कमार, कंडरा, धनवार, बिरहोर।" (कमार को अन्य पृष्ठ पर बाँस-शिल्प में सबसे निपुण जनजाति कहा गया है।)

सिसल शिल्पकला

क्षेत्र परचनपाल (बस्तर) है और जनजातियाँ मुड़िया व भतरा हैं। प्रक्रिया यह है कि बाँस की एक प्रजाति, राम-बाँस, के पत्तों को सुखाकर रेशा निकाला जाता है। इन रेशों को अलग-अलग रंगों में डुबाकर और फिर सुखाकर सजावटी सामग्री, खिलौने और वॉल हैंगिंग बनाए जाते हैं।

तुम्बा शिल्पकला

क्षेत्र बस्तर, जनजाति अबूझमाड़िया। इससे झूमर जैसी सजावटी सामग्री बनाई जाती है। (अबूझमाड़िया के जीवन में तुम्बे का विशेष महत्व बताया गया है, यह आगे के अध्याय में आएगा।)

हस्तशिल्प विकास बोर्ड

बिंदुविवरण
स्थापना2001
स्थापित करने वालाग्रामोद्योग विभाग, छत्तीसगढ़ शासन
कार्यालयहाट परिसर पंडरी, रायपुर
कार्य क्षेत्रसम्पूर्ण छत्तीसगढ़

प्रमुख जनजातीय चित्रकार

चित्रकारक्षेत्र / कला
बेलगूर मंडावीनारायणपुर / बस्तर
नर्मदा सोनसायगोंड चित्रकारी (रायपुर)
जनगण सिंह श्यामगोंड चित्रकारी
आनंद सिंह श्याम व कलावती गोंडगोंड चित्रकारी
निवास विश्वकर्माबस्तर
बंशीलाल विश्वकर्माबस्तर (आकृति नामक कला संस्थान की स्थापना)
देवेन्द्र सिंह ठाकुरबीजापुर
खेमदास वैष्णवदंतेवाड़ा
बनमाली नेतामकांकेर (बनसागर)
सुरेश विश्वकर्माजगदलपुर

नाम "जनगण सिंह श्याम" पृष्ठ पर इसी रूप में छपा है; इसकी वर्तनी की पुष्टि नहीं की गई है, इसलिए इसे पुस्तक की वर्तनी के अनुसार ही याद रखें।

प्रमुख जनजातीय शिल्पकार

शिल्पकारशिल्पक्षेत्र
जयदेव बघेलघड़वा शिल्पकलाबस्तर
मानिकराम घड़वाघड़वा शिल्पकलाबस्तर
सुखचंद प्रसादघड़वा शिल्पकलाबस्तर
पदुमलालघड़वा शिल्पकलाबस्तर
गोविन्द राम झाराझारा शिल्पकलाएकताल (रायगढ़)
रामलाल झाराझारा शिल्पकलाएकताल (रायगढ़)
बुधियारीन देवीबेलमेटल शिल्पकलाक्षेत्र दिया नहीं गया
सोना बाईरजवार भित्ती शिल्पकलालखनपुर (सरगुजा); राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्तकर्ता
अजय मंडावीकाष्ठ शिल्पकलाकांकेर
क्षितरूराममृतिका शिल्पकलाबस्तर
देवनाथमृतिका शिल्पकलाएड़का (बस्तर)
शंभूमृतिका शिल्पकलानारायणपुर
जगदेवमृतिका शिल्पकलाबस्तर
सहदेवमृतिका शिल्पकलाबस्तर
चंदन सिंहशिल्प नहीं दिया गयानगरनार (बस्तर)
गेंदराम सागरशिल्प नहीं दिया गयासक्ती

यह तालिका पंक्ति के अनुसार पढ़ी गई है; छपे पृष्ठ पर तीसरा स्तंभ कुछ जगह ऊपर-नीचे खिसका हुआ है, इसलिए बुधियारीन देवी, चंदन सिंह और गेंदराम सागर की पंक्तियों का मिलान सावधानी से किया गया है। जहाँ पुस्तक ने कुछ नहीं दिया, वहाँ हमने भी अनुमान नहीं जोड़ा।

तुलना एवं संबंध

शिल्पक्षेत्रजनजातिकच्चा माल / विशेषता
मृत्तिकाबस्तर, सरगुजारजवार (सरगुजा)मिट्टी; सफ़ेद मिट्टी व स्थानीय रंग (सरगुजा)
काष्ठबस्तरमुरिया, अबूझमाड़ियालकड़ी; मृतक स्तंभ, गोटुल खंभे
चिमनी / दीपकसरगुजामलार-
पत्ताबस्तर-सरगुजा-मध्यशिकारी, पारधीछिन्द व साल के पत्ते
कंघीबस्तरमुड़िया, बंजारालकड़ी; प्रेम का उपहार
प्रस्तरबस्तर (चित्रकोट)मुड़िया, माड़ियापत्थर पर छेनी-हथौड़ा
बाँसपूरा राज्यकमार, कंडरा, धनवार, बिरहोरटुकनी, झउहा, पर्रा, सोफा
सिसलपरचनपाल, बस्तरमुड़िया, भतराराम-बाँस के पत्तों का रेशा
तुम्बाबस्तरअबूझमाड़ियाझूमर जैसी सजावट
जनजातिस्तंभ
माड़ियामृतक स्तंभ (हनालगट्टा आदि)
कोरकूमेघनाथ स्तंभ
मुरियागोटुल स्तंभ
भतरासेमल स्तंभ
भीलगाथा

याद रखने योग्य बिंदु

  • सरगुजा की मिट्टी-कला का नाम रजवार भित्ति शिल्पकला है; कलाकार सोनाबाई रजवार (लखनपुर)।
  • बस्तर के मिट्टी शिल्प के चार केंद्र: नगरनार, कुम्हारपारा-कोण्डागाँव, नारायणपुर, एड़का।
  • काष्ठ शिल्प में मुरिया और अबूझमाड़िया प्रसिद्ध हैं; अजय मण्डावी (कांकेर) पद्मश्री 2023।
  • मृतक स्तंभ का दूसरा नाम गायता पखना है (माड़िया)।
  • गामावाड़ा (दंतेवाड़ा) में मृतक स्तंभ बड़ी संख्या में हैं।
  • भतरा का सेमल स्तंभ होली-डंडारी नृत्य पर लगता है।
  • चिमनी/दीपक शिल्प = सरगुजा + मलार।
  • पत्ता शिल्प = शिकारी व पारधी; कंघी शिल्प = मुड़िया व बंजारा।
  • प्रस्तर शिल्प में चित्रकोट प्रसिद्ध है।
  • सिसल शिल्प का क्षेत्र परचनपाल (बस्तर) है और कच्चा माल राम-बाँस के पत्तों का रेशा।
  • तुम्बा शिल्प अबूझमाड़िया से जुड़ा है।
  • हस्तशिल्प विकास बोर्ड की स्थापना 2001 में हुई; कार्यालय पंडरी, रायपुर।
  • गोंड चित्रकारी के नाम: नर्मदा सोनसाय, जनगण सिंह श्याम, आनंद सिंह श्याम, कलावती गोंड।
  • बंशीलाल विश्वकर्मा ने आकृति नामक कला संस्थान की स्थापना की।
  • एकताल (रायगढ़) की पहचान झारा शिल्पकला से है।

स्मरण सूत्र

  • बाँस के चार साथी: "कमार, कंडरा, धनवार, बिरहोर" - "क-क-ध-बि"।
  • बस्तर मृत्तिका के चार केंद्र: "न-कु-ना-ए" (नगरनार, कुम्हारपारा, नारायणपुर, एड़का)।
  • स्तंभ-जोड़ी: माड़िया-मृतक, कोरकू-मेघनाथ, मुरिया-गोटुल, भतरा-सेमल, भील-गाथा - "मा-मृ, को-मे, मु-गो, भ-से, भी-गा"।

परीक्षा में कैसे पूछा जाता है

  • कला के नाम से क्षेत्र या जनजाति पूछी जाती है (जैसे चिमनी/दीपक शिल्प किस जनजाति का)।
  • जनजाति से स्तंभ का नाम पूछा जाता है; मेघनाथ स्तंभ और गोटुल स्तंभ के विकल्प आम हैं।
  • शिल्पकार से शिल्प का मिलान: अजय मण्डावी - काष्ठ; सोनाबाई - रजवार भित्ति; झारा - एकताल।
  • प्रश्न-पूल में इस अध्याय पर बहुत कम प्रश्न मिले, जिनमें से मलार वाला प्रश्न प्रमुख है; बाँस शिल्प का एक प्रश्न गलत विकल्प (हल्बा) के साथ मिला और अस्वीकार किया गया।

स्वयं जाँचें

  1. सरगुजा की मिट्टी-कला किस नाम से जानी जाती है? उत्तर: रजवार भित्ति शिल्पकला।
  2. माड़िया मृतक स्तंभ का दूसरा नाम क्या है? उत्तर: गायता पखना।
  3. सिसल शिल्प में किस पौधे के पत्तों से रेशा निकाला जाता है? उत्तर: राम-बाँस (बाँस की एक प्रजाति)।
  4. हस्तशिल्प विकास बोर्ड कब स्थापित हुआ? उत्तर: 2001 में।
  5. भतरा जनजाति का सेमल स्तंभ किस अवसर पर लगता है? उत्तर: होली-डंडारी नृत्य के समय।

अभ्यास प्रश्न

  1. सरगुजा जिले की निम्नलिखित में से कौन सी जनजाति अपने धातु कला विशेष रुप से दीपक (चिमनी) के निर्माण के लिए प्रसिध्द है?

    • (A) ओरांव
    • (B) मलार
    • (C) पण्डो
    • (D) कोरवा

उत्तरमाला एवं व्याख्या

  1. (B) - चिमनी/दीपक काष्ठ शिल्प सरगुजा क्षेत्र में मलार जनजाति करती है।
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