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छत्तीसगढ़ की जनजातियाँ — सम्पूर्ण अध्ययन · Chapter 14
जनजाति गीत, नाट्य, पारद परम्परा एवं परम्परागत गायक

जनजाति गीत, नाट्य, पारद परम्परा एवं परम्परागत गायक

गीत, नाट्य और शिकार-परम्परा (पारद) जनजातीय जीवन की मौखिक विरासत हैं। यहाँ धनकुल, गोटुल पाटा, करमा, तारा, छेरता, रीलो, लेंजा, चइत परब, फाग, लिंगोपाटा, लिंगोपेन, गौरा-गौरी, कोटनी और मरम पाटा गीतों का, माओपाटा, भतरानाट और दहिकांदो नाट्य का, पारद परम्परा का तथा बसदेवा, परधान, पंवारा और देवार गायकों का विवरण है। परीक्षा में गीत का अवसर, जनजाति, भाषा या वाद्य पूछा जाता है, इसलिए हर गीत की तालिका सावधानी से याद करें।

जनजाति गीत

धनकुल / जगार गीत

  • क्षेत्र: बस्तर अंचल।
  • जनजाति: हल्बा और भतरा।
  • गायन की भाषा: हल्बी।
  • वाद्य: मटकी (धनकुल घड़ा), सूपा, बाँस की खपच्ची एवं धनुष से मिलकर बना होता है।
  • धनकुल वाद्य चार जगारों के गायन में बजाया जाता है: आठे जगार, तीजा जगार, लक्ष्मी जगार, बाली जगार। वर्तमान में लक्ष्मी जगार, तीजा जगार एवं बाली जगार का आयोजन होता है।
  • यह सामूहिक रूप से मनाया जाता है। जगार का आशय सांस्कृतिक जागरण से है, जिसमें बस्तर के सांस्कृतिक, सामाजिक परिवेश, धार्मिकता तथा पौराणिक व्याख्यान प्रस्तुत किए जाते हैं।

अन्य जनजाति गीत (तालिका)

गीतअवसर / प्रकृतिजनजाति एवं विशेष
हुलकी पाटाबस्तर संभाग-
गोटुल पाटामृत्यु के अवसर परजनजाति मुड़िया; कथानक राजा जोलोंगसाय की गाथा; भाषा हल्बी; वीर गीत के नाम से जाना जाता है
करमा गीतकरमा नृत्य के समय कर्म देवता को प्रसन्न करने के लिएबैगा, उराँव, मुण्डा, कमार, गोंड़; विरन गीत, कमार गीत का हिस्सा है
तारा गीतपूष माह की रात्रि में (नई फसल आने पर)केवल नवयुवतियों द्वारा
छेरता गीतपूष पूर्णिमा (नई फसल आने की खुशी में)मुख्यतः नवयुवकों द्वारा; अन्य नाम छेरछेरा (क्षेत्र बस्तर); बालक-बालिकाओं की टोलियाँ नगरों और गाँवों में कई दिनों तक हर्षोल्लास से गाकर नई फसल का दान माँगती हैं
रीलो / रैला गीतवैवाहिक गीतमुड़िया एवं माड़िया; स्त्री व पुरुष द्वारा बारी-बारी से गाया जाता है
लेंजा गीतकिसी भी समय (कोई तिथि निर्धारित नहीं)विशुद्ध हल्बी गीत; स्त्रियों व पुरुषों द्वारा साथ-साथ तथा कभी-कभी पृथक् रूप से
चइत परब गीतचैत्र माह की रातों मेंबस्तर क्षेत्र में स्त्री तथा पुरुषों के बीच प्रतिद्वंद्विता का गीत; समाप्ति मूंदी माँगतो (अंगूठी प्राप्ति) से
फाग गीतफाल्गुन माह में होली के अवसर पर नृत्य करते समयगोंड़ एवं बैगा; वाद्य नगाड़ा/नंगारा
लिंगोपाटा गीत-जनजाति परधान; धरती का मालिक लिंगो को बताया गया है
लिंगोपेन गीतलिंगोपेन देव की स्तुति मेंमुड़िया
गौरा-गौरी गीतकार्तिक माह (दीपावली के समय)गोंड़; शिव-पार्वती का विवाह समारोह आयोजित कर पूजा-अर्चना
कोटनी गीत-शृंगार प्रधान वैवाहिक गीत; स्त्री एवं पुरुष सामूहिक रूप से गाते हैं; ओड़िया और भतरी भाषा का प्रभाव
मरम पाटा गीत-एक प्रकार का विवाह गीत

पुस्तक का नोट: जनजाति नृत्य एवं गीत को पाटा / एडन्ना के नाम से भी संबोधित किया जाता है।

लोक गीतों के स्वरूप (पाटा के प्रकार)

पाटासंबंधित गीत
जात्रापाटाधार्मिक गीत
पुरूड़पाटाजन्म गीत
हनाल पाटामृत्यु गीत
चुर्चापाटा, मरम पाटा, रीलो पाटा, पेण्डुल पाटाविवाह गीत
कुर्राल पाटानृत्य गीत
कर्सना पाटाखेल गीत
हुलकी पाटा / लेंगना पाटाविसर्जन गीत
चिटकुल पाटाव्यंग्य गीत
डिवाड पाटादीवाली गीत
हेले पाटानरबलि गीत

विसंगति पर ध्यान दें: पृष्ठ 392 पर हुलकी पाटा के आगे केवल "बस्तर संभाग" लिखा है, जबकि इस स्वरूप-तालिका में हुलकी पाटा/लेंगना पाटा को विसर्जन गीत बताया गया है। साथ ही पृष्ठ पर "लेंजा" और "लेंगना" अलग नाम हैं; इन्हें एक न मानें।

जनजाति नाट्य

माओपाटा (गौर नाट्य)

  • आशय: गोंडी भाषा में माओ का अर्थ गौर (बायसन) तथा पाटा का अर्थ नृत्य होता है।
  • प्रमुख जनजाति: मुड़िया।
  • शिकार पर आधारित नाट्य है; इसमें जंगली भैंसे या साँभर के शिकार का मंचन किया जाता है।
  • वाद्य: कोटोड़का, टिमकी।

भतरानाट

  • क्षेत्र: बस्तर अंचल; जनजाति: भतरा; इसे बस्तर का आदिवासी थियेटर भी कहते हैं।
  • वाद्य: मृदंग, हारमोनियम, नगाड़ा, मंजीरा व मोहरी।
  • उद्देश्य: मनोरंजन तथा सामाजिक विद्रूपताओं पर प्रहार करने का प्रयास।
  • सभी कलाकार केवल पुरुष सदस्य होते हैं; एक मंडली में 20-40 कलाकार होते हैं; कलाकारों को नाट कुरया कहा जाता है; प्रमुख नाट-गुरू होता है जिसके समक्ष नाट का प्रथम प्रदर्शन किया जाता है।
  • कथावस्तु: पौराणिक प्रसंग/घटनाएँ; भाषा भतरी।
  • ओडिशा का प्रभाव स्पष्ट दिखता है, अतः इसे उड़िया नाट भी कहते हैं; कथानक युद्ध प्रधान होता है।
  • यह भरतमुनि के नाट्यशास्त्र पर आधारित है; स्त्री सदस्य भाग नहीं लेती हैं; सामान्य मंच पर मंचित होता है; पात्रों का शृंगार होता है; खुले मैदान में चारों ओर खुला मंच तैयार कर उस पर चंदोवा लगाया जाता है।

दहिकांदो

दहिकांदो कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर होता है। यह करमा और रास का सम्मिलित रूप है, जिसमें कदम्ब वृक्ष के नीचे राधा व कृष्ण की मूर्ति स्थापित कर उसके चारों ओर घूम-घूमकर नृत्य किया जाता है।

खम्बस्वांग (कोरकू)

  • जनजाति: कोरकू; अर्थ: खम्ब के आस-पास किया जाने वाला प्रहसन।
  • आयोजन: क्वाँर नवरात्रि से देव प्रबोधिनी एकादशी तक।
  • कोरकुओं की समूची रंग-चेतना तीन पारंपरिक स्वाँगों में मिलती है: पहली झेरी, दूसरी पारडी और तीसरी खम्ब-स्वाँग।
  • प्रत्येक कोरकू गाँव के बीच में एक मेघनाथ खम्ब होता है; जहाँ नहीं होता, वहाँ अस्थायी खम्ब गाड़कर मेघनाथ की स्थापना की जाती है।

बस्तर के आदिवासी समाज में पारद परम्परा

पारद का सामान्य अर्थ "शिकार" होता है। भाषायी शब्द: पारद (हल्बी) और वेट्टा (गोंडी)। अक्षय तृतीया/अक्ती के पश्चात् आमा जोगानी/माटी तिहार में पारद खेलने जाने की परम्परा है और यह आदिवासी समाज के लिए एक धार्मिक अनुष्ठान है। गंवर नृत्य (जंगली भैंसे के शिकार संबंधी नृत्य) पारद से संबंधित है। इसमें सिरहा के ऊपर आरूढ़ देवता से अनुमति ली जाती है, गाँव के प्रत्येक घर से एक आदमी का भाग लेना अनिवार्य होता है और बस्तर का आदिवासी समाज पारद खेलने समूह में जाता है। गायता या पुजारी के चुनाव के बाद गाँव वाले अपने निर्णय की सत्य परीक्षा हेतु पारद का आयोजन करते हैं।

परम्परागत लोक गीतकार

गीतकारविवरण
बसदेवामुख्य कार्य गायकी; अन्य नाम हरबोला या जय गंगान; लोकगाथा गीत-गायन की परम्परा
परधानगीत लिंगोपाटा; यह गीत गोंड़ों के गौरवपूर्ण इतिहास से संबंधित
पंवारापद्य-गद्य गायन शैली; प्रश्नोत्तरी शैली में लोकगाथा गायन
देवारछत्तीसगढ़ की परम्परागत लोक गायक जाति; रायपुरिहा देवार सारंगी, रतनपुरिहा देवार ढुंगरू वाद्य; कथनक: चंदा रउताइन, नगेसर कइना, दसमत आदि; सीताराम नायक पण्डवानी कथा गायकी के साथ बंदर का खेल दिखाते हैं; देवार स्त्रियाँ परम्परागत रूप से गोदना गोदने का कार्य करती हैं

तुलना एवं संबंध

नाट्य / परम्पराजनजातिविशेष
माओपाटामुड़ियागौर/साँभर शिकार का मंचन; कोटोड़का, टिमकी
भतरानाटभतराबस्तर, केवल पुरुष, भतरी भाषा, ओडिशा का प्रभाव
दहिकांदो-जन्माष्टमी; कदम्ब के नीचे राधा-कृष्ण
खम्बस्वांगकोरकूक्वाँर नवरात्रि से देव प्रबोधिनी एकादशी; मेघनाथ खम्ब
पारदबस्तर का आदिवासी समाजशिकार; सत्य परीक्षा; गंवर नृत्य
गीतकिससे जुड़ाभाषा / वाद्य
धनकुल/जगारहल्बा, भतराहल्बी; धनकुल
गोटुल पाटामुड़िया, मृत्युहल्बी
लेंजाकोई तिथि नहींहल्बी
फागगोंड़, बैगानगाड़ा
कोटनीवैवाहिकओड़िया-भतरी प्रभाव

याद रखने योग्य बिंदु

  • धनकुल/जगार बस्तर का हल्बा-भतरा गीत है; भाषा हल्बी।
  • धनकुल वाद्य: मटकी, सूपा, बाँस की खपच्ची और धनुष।
  • चार जगार: आठे, तीजा, लक्ष्मी, बाली; वर्तमान में तीन का आयोजन।
  • गोटुल पाटा मृत्यु पर गाया जाता है, मुड़िया, राजा जोलोंगसाय की गाथा, वीर गीत।
  • करमा गीत कर्म देवता को प्रसन्न करने हेतु; विरन गीत कमार गीत का भाग।
  • छेरता गीत पूष पूर्णिमा को; तारा गीत पूष की रात, केवल नवयुवतियाँ।
  • रीलो/रैला वैवाहिक गीत है, मुड़िया एवं माड़िया।
  • फाग गीत में नगाड़ा; गौरा-गौरी कार्तिक में गोंड़ों का।
  • लिंगोपाटा परधान का गीत है; लिंगोपेन मुड़िया का।
  • माओपाटा शिकार आधारित मुड़िया नाट्य है; भतरानाट भतरा का आदिवासी थियेटर।
  • भतरानाट में सभी कलाकार पुरुष; मंडली में 20-40; नाट-गुरू प्रमुख।
  • खम्बस्वांग कोरकू का: झेरी, पारडी, खम्ब-स्वांग।
  • पारद = शिकार (हल्बी); वेट्टा (गोंडी); अक्ती के बाद।
  • बसदेवा = हरबोला; देवार = गोदना गोदने वाली स्त्रियाँ, सारंगी/ढुंगरू।

स्मरण सूत्र

  • "धन-कुल जगार, हल्बा-भतरा" = धनकुल के गायक हल्बा-भतरा।
  • "मृत्यु में मुड़िया का गोटुल" = गोटुल पाटा मृत्यु गीत।
  • "माओ = गौर, पाटा = नृत्य" = माओपाटा गौर नाट्य।
  • "बसदेवा-परधान-पंवारा-देवार" = चार परम्परागत गीतकार।

परीक्षा में कैसे पूछा जाता है

गीत के अवसर (पूष, चैत्र, फाल्गुन, कार्तिक) और जनजाति का जोड़ा बनाकर पूछा जाता है।

पूल में गोटुल से संबंधित एक प्रश्न है; उसमें पुस्तक के अनुसार गोटुल पाटा मृत्यु के अवसर का गीत है, इसलिए वैसा विकल्प चुनें जो पृष्ठ से मेल खाए।

भतरानाट में केवल पुरुष कलाकार, ओडिशा का प्रभाव और भतरी भाषा जैसे तथ्य पूछे जाते हैं।

देवार, बसदेवा जैसे गायकों के वाद्य और अन्य नाम पूछे जाते हैं।

स्वयं जाँचें

  1. धनकुल के चार जगार कौन-से हैं? आठे, तीजा, लक्ष्मी, बाली।
  2. भतरानाट की भाषा क्या है? भतरी।
  3. माओपाटा में किसका मंचन होता है? जंगली भैंसे या साँभर के शिकार का।
  4. छेरता गीत किस दिन गाया जाता है? पूष पूर्णिमा को, नई फसल की खुशी में।
  5. बसदेवा का अन्य नाम? हरबोला या जय गंगान।

अभ्यास प्रश्न

  1. गोटुल पारा नामक मृत्यु गीत किस जनजाति से सम्बन्धित है?

    • (A) गोण्ड
    • (B) उराँव
    • (C) मुड़िया
    • (D) कमार

उत्तरमाला एवं व्याख्या

  1. (C) - पुस्तक के अनुसार गोटुल पाटा गीत मृत्यु के अवसर पर मुड़िया जनजाति द्वारा गाया जाता है (राजा जोलोंगसाय की गाथा)।
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