जनजातीय नृत्य एवं मृतक संस्कार
इस अध्याय में छत्तीसगढ़ की अलग-अलग जनजातियों से जुड़े नृत्य (सरहुल, थापड़ी, ढाँढल, डंडारी, बार, दमनच, सैतम, कोलदहका) और उनके अवसर, वाद्य तथा विशेषताएँ दी गई हैं। इसके बाद मृतक संस्कार की उन रीतियों का संकलन है जो अलग-अलग जनजातियों में पाई जाती हैं। परीक्षा में प्रायः "यह नृत्य किस जनजाति का है", "किस माह में होता है", "कौन-सा वाद्य बजता है" और "किस जनजाति में कौन-सी शब्दावली या प्रथा है" जैसे प्रश्न आते हैं। CGPSC, व्यापम और पटवारी तीनों में इन्हें जोड़ी मिलान के रूप में पूछा जाता है, इसलिए हर नृत्य को जनजाति-अवसर-वाद्य की त्रयी में याद करना उपयोगी है।
सरहुल नृत्य (उराँव)
सरहुल सरगुजा अंचल में उराँव तथा मुण्डा वर्ग की जनजातियों का अनुष्ठानिक नृत्य है। यह एक सामूहिक (समूह) नृत्य है और इसे प्रकृति की पूजा का नृत्य भी कहा जाता है। इसमें मांदर और झाँझ वाद्य बजाए जाते हैं। यह चैत्र पूर्णिमा के अवसर पर होता है। इस नृत्य में साल वृक्ष की पूजा की जाती है और जब साल के पेड़ में फूल लगते हैं, तब यह नृत्य किया जाता है। पुरुष नर्तक विशेष प्रकार का पीला साफा बाँधते हैं, जबकि महिलाएँ अपने जूड़े में बगुले के पंख की कलगी लगाती हैं।
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| जनजाति | उराँव (मुण्डा वर्ग की जनजातियों के साथ) |
| क्षेत्र | सरगुजा अंचल |
| स्वरूप | सामूहिक, अनुष्ठानिक, प्रकृति पूजा |
| वाद्य | मांदर, झाँझ |
| अवसर | चैत्र पूर्णिमा |
| पूजा | साल वृक्ष |
| वेशभूषा | पुरुषों का पीला साफा; महिलाओं के जूड़े में बगुले के पंख की कलगी |
कोरकू जनजाति से जुड़े नृत्य
पुस्तक के अनुसार कोरकू जनजाति से तीन नृत्य जुड़े हैं: थापड़ी, ढाँढल और डंडारी (डंडारी में भतरा भी शामिल बताई गई है)। नीचे क्रम से इनका विवरण है।
थापड़ी नृत्य
- अवसर: बैशाख माह।
- जनजाति: कोरकू।
- वाद्य: चिटकोरा और पंजा; मुख्य वाद्य ढोलक और बाँसुरी।
- इसमें वर पक्ष की ओर से एक व्यक्ति हाथी बनकर नृत्य करता है।
- स्त्री और पुरुष दोनों भाग लेते हैं; पुरुष हाथ में पंजा और महिला नर्तक दोनों हाथों में चिटकोरा बजाती हैं।
- नृत्य के आरंभ में कोरकू जनजाति मेघनाथ स्तम्भ की स्थापना करती है।
ढाँढल नृत्य
- जनजाति: कोरकू।
- अवसर: ज्येष्ठ-आषाढ़ माह की रात्रि में।
- वाद्य: ढोलक, टिमकी, बाँसुरी, मृदंग आदि।
- विशेषता: लोग एक-दूसरे पर छोटे-छोटे डंडों से प्रहार करते हैं।
डंडारी नृत्य
- अवसर: होली (फाल्गुन माह)।
- जनजाति: भतरा एवं कोरकू।
- यह जनजाति चबूतरे में सेमल स्तम्भ स्थापित कर चारों ओर घूम-घूमकर नृत्य करती है।
- बस्तर के डंडारी नाच का संबंध मुख्यतः होली त्यौहार से है।
ध्यान दें: थापड़ी में स्थापित स्तम्भ मेघनाथ का है, जबकि डंडारी में सेमल का स्तम्भ है। इन दोनों स्तम्भों को आपस में न मिलाएँ।
कंवर जनजाति का बार नृत्य
- स्वरूप: समूह नृत्य।
- आयोजन: माघ माह में, पाँच वर्षों के अंतराल पर।
- यह छत्तीसगढ़ की कंवर जनजाति का प्रमुख लोक नृत्य है।
- गाँव के बीचों-बीच खुली जगह पर भीम देवता की स्थापना की जाती है।
- यह नृत्य लगातार 12 दिनों तक चलता है।
- कटघोरा अंचल का बार नृत्य सर्वाधिक प्रसिद्ध है।
पहाड़ी कोरवा का दमनच / डोमनच नृत्य
- अवसर: विवाह।
- विधा: नृत्य; सामान्यतः इसमें गायन नहीं किया जाता।
- क्षेत्र: सामान्यतः जशपुर, कोरबा अंचल।
- छत्तीसगढ़ के सभी लोकनृत्यों में इसे सबसे "भयानक नृत्य" माना गया है।
- इसमें स्त्री एवं पुरुष दोनों भाग लेते हैं।
भारिया का सैतम नृत्य और कोल का कोलदहका नृत्य
सैतम नृत्य भारिया जनजाति की महिलाओं द्वारा किया जाता है; पृष्ठ में इसके बारे में इतनी ही जानकारी दी गई है। कोल जनजाति का कोलदहका (कोलहाई) नृत्य सरगुजा क्षेत्र (कोरिया) में प्रचलित है। इसमें झाँझ और ढोलक बजते हैं। यह सवाल-जवाब शैली पर आधारित है: पुरुष ढोल के साथ गायन-वादन करते हैं और महिलाएँ नृत्य करती हैं। पुरुष वादक और गायक दोनों की भूमिका निभाते हैं। महिलाएँ सामान्य वेशभूषा में नाचती हैं और साथ-साथ गाती भी हैं तथा उनके चेहरे पर घूँघट होता है।
मृतक संस्कार
मृत्यु के बाद की रीतियाँ जनजातियों में अलग-अलग हैं। किसी में स्मृति-स्तम्भ गाड़ा जाता है, किसी में शोक की अवधि तय है और किसी में घर ही छोड़ दिया जाता है। तालिका में हर जनजाति की रीति एक साथ दी गई है।
| जनजाति | संस्कार विशेष |
|---|---|
| माड़िया / दण्डामी माड़िया / बायसन हार्न माड़िया | कूटेह संस्कार: तीसरे दिन पूजा कक्ष में मृतात्मा को पीतर देवों से मिलाना तथा हनाल गट्टा (स्मृति स्तम्भ) स्थापित करने की परम्परा; मृतक स्तम्भ स्थापित करने की परम्परा |
| अबूझमाड़िया | अनाल गड्या (मृतक स्तम्भ) की स्थापना |
| बैगा | मृत्यु के बाद शुद्धिकरण संस्कार को मादी कहते हैं |
| गोंड़ | तीसरे दिन कोज्जी तथा दसवें दिन कुण्डा मिलन संस्कार |
| दोरला / कोया / कोयतुर | मृत्यु गीत में कलेगीराजू अर्थात् कलिंग राजा का उल्लेख; बुजुर्ग स्त्रियाँ पेंतर पाटा (मृत्यु गीत) गाती हैं। शब्दावली: वड्डे = धार्मिक प्रमुख; तलूर कुंडा = अग्नि हण्डी; दिनांक = क्रियाकर्म; पस पेर = शुद्धिकरण हेतु हल्दी पानी छिड़कना |
| कोरकू | सिडोली प्रथा (मृतक को दफनाना तथा लकड़ी का स्तम्भ गाड़ना) |
| कोरवा | नवाधाती / नवाधानी प्रथा (10 दिन तक शोक मनाना); क्रियाकर्म के समय कुमारी भात की परम्परा |
| भतरा | शब्दावली: टरंडी = अर्थी / टिकठी; मड़ाभाटा = श्मशान; बाँधन कटनी = मामा की आत्मा की शांति हेतु भांजे द्वारा किया जाने वाला रस्म |
| उराँव | पटरा = शव को श्मशान ले जाने हेतु बाँस से निर्मित; छाई भितर = मृत आत्मा को पूर्वजों से मिलाने की क्रिया |
| पहाड़ी कोरवा | जिस झोपड़ी/घर में मृत्यु होती है उसे नष्ट कर नई झोपड़ी का निर्माण किया जाता है |
| भुंजिया | गोतियार (समगोत्रीय) की मृत्यु होने पर गोतियार के घर का चूल्हा तथा पीने के पानी का मटका तोड़ दिया जाता है |
| बिरहोर | बिस्सर खाने की प्रथा |
| कमार | घर के सदस्य की मृत्यु होने पर नया घर बना लेते हैं |
तुलना एवं संबंध
| नृत्य | जनजाति | अवसर / माह | वाद्य / विशेष |
|---|---|---|---|
| सरहुल | उराँव | चैत्र पूर्णिमा | मांदर, झाँझ; साल पूजा |
| थापड़ी | कोरकू | बैशाख | चिटकोरा, पंजा; ढोलक, बाँसुरी; मेघनाथ स्तम्भ |
| ढाँढल | कोरकू | ज्येष्ठ-आषाढ़ की रात | ढोलक, टिमकी, बाँसुरी, मृदंग; डंडों से प्रहार |
| डंडारी | भतरा, कोरकू | फाल्गुन (होली) | सेमल स्तम्भ |
| बार | कंवर | माघ (5 वर्ष में) | भीम देवता; 12 दिन; कटघोरा |
| दमनच/डोमनच | पहाड़ी कोरवा | विवाह | जशपुर-कोरबा; भयानक नृत्य |
| सैतम | भारिया | - | महिलाओं द्वारा |
| कोलदहका | कोल | - | झाँझ, ढोलक; सवाल-जवाब; कोरिया |
स्तम्भ/स्मारक से जुड़ी रीतियों को अलग से देखें: माड़िया का हनाल गट्टा, अबूझमाड़िया का अनाल गड्या और कोरकू की सिडोली प्रथा तीनों में स्तम्भ गाड़ा जाता है, जबकि पहाड़ी कोरवा और कमार घर छोड़ या नष्ट कर देते हैं।
याद रखने योग्य बिंदु
- सरहुल = उराँव, सरगुजा, चैत्र पूर्णिमा, साल पूजा, मांदर-झाँझ।
- सरहुल में पुरुष पीला साफा और महिलाएँ बगुले के पंख की कलगी लगाती हैं।
- थापड़ी कोरकू का नृत्य है, बैशाख में; वर पक्ष का व्यक्ति हाथी बनता है।
- थापड़ी के आरंभ में मेघनाथ स्तम्भ स्थापित होता है।
- ढाँढल में डंडों से एक-दूसरे पर प्रहार किया जाता है।
- डंडारी होली (फाल्गुन) का नृत्य है; भतरा एवं कोरकू; सेमल स्तम्भ।
- बार नृत्य कंवर का है: माघ, पाँच वर्ष में, 12 दिन, भीम देवता, कटघोरा।
- दमनच पहाड़ी कोरवा का विवाह नृत्य है और सबसे भयानक माना गया है।
- सैतम नृत्य भारिया की महिलाएँ करती हैं।
- कोलदहका में सवाल-जवाब शैली है और महिलाओं के चेहरे पर घूँघट रहता है।
- माड़िया में हनाल गट्टा, अबूझमाड़िया में अनाल गड्या स्तम्भ।
- बैगा में शुद्धिकरण = मादी; गोंड़ में तीसरे दिन कोज्जी, दसवें दिन कुण्डा मिलन।
- कोरवा में नवाधाती (10 दिन शोक) और कुमारी भात।
- उराँव: पटरा (बाँस की अर्थी), छाई भितर।
- कमार और पहाड़ी कोरवा में मृत्यु के बाद घर बदला जाता है।
स्मरण सूत्र
- "थापड़ी-ढाँढल-डंडारी" तीनों में "ड-ढ" ध्वनि: कोरकू के नृत्य याद रखें; डंडारी में भतरा भी जुड़ा है।
- "बार बारह" = बार नृत्य 12 दिन तक चलता है, माघ में, पाँच साल पर।
- "हनाल-अनाल" = माड़िया का हनाल गट्टा, अबूझमाड़िया का अनाल गड्या।
- "बैगा की मादी, गोंड़ का कुण्डा" = शुद्धिकरण और दसवें दिन का मिलन।
परीक्षा में कैसे पूछा जाता है
सबसे अधिक पूछा जाने वाला रूप है नृत्य से जनजाति का मिलान (जैसे सरहुल-उराँव, बार-कंवर, दमनच-पहाड़ी कोरवा)।
पूल के प्रश्नों में नृत्य का नाम देकर जनजाति या वाद्य पूछा गया है, तथा दहका/कोलदहका जैसे नाम की वर्तनी बदलकर भी प्रश्न आए हैं।
मृतक संस्कार से माड़िया, बैगा, गोंड़, कोरवा, भतरा आदि की शब्दावली के जोड़े पूछे जाते हैं।
जिन प्रश्नों में नृत्य का नाम अधूरा या अलग वर्तनी में हो, उन्हें पुस्तक के नाम से मिलाकर ही उत्तर दें।
स्वयं जाँचें
- सरहुल किस माह में और किस वृक्ष की पूजा के साथ होता है? चैत्र पूर्णिमा को साल वृक्ष की पूजा के साथ।
- थापड़ी नृत्य में हाथी कौन बनता है? वर पक्ष की ओर से एक व्यक्ति।
- बार नृत्य कितने दिन चलता है? लगातार 12 दिन।
- बैगा में मृत्यु के बाद के शुद्धिकरण को क्या कहते हैं? मादी।
- कोरवा में शोक कितने दिन का मनाया जाता है? 10 दिन (नवाधाती प्रथा)।
अभ्यास प्रश्न
सरहुल किस जनजाति का पारंपरिक नृत्य है?
- (A) उरांव
- (B) गोंड़
- (C) भतरा
- (D) मुरिया
‘दहका नृत्य’ इस राज्य के किस जनजाति का प्रमुख नृत्य है?
- (A) परधान
- (B) दोरला
- (C) कोल
- (D) उरांव
उत्तरमाला एवं व्याख्या
- (A) - सरहुल सरगुजा अंचल में उराँव तथा मुण्डा वर्ग की जनजातियों का अनुष्ठानिक नृत्य है, जिसमें साल वृक्ष की पूजा होती है।
- (C) - कोलदहका/कोलहाई नृत्य कोल जनजाति का है, जो सरगुजा (कोरिया) क्षेत्र में प्रचलित है।