जनजातियों के कार्य, शिल्प, पंचायत, पेय एवं कृषि
किसी भी जनजाति को पहचानने के चार सूत्र हैं: वह क्या काम करती है, उसका मुखिया किस नाम से पुकारा जाता है, वह क्या पीती है और खेती कैसे करती है। यह अध्याय इन्हीं सूत्रों की तालिकाओं को एक जगह रखता है। साथ में जनजाति शिल्प, रसोईघर के नाम, निवास स्थान, जनजातियों पर लिखी पुस्तकें और गोदना भी है। सीजीपीएससी और व्यापम में "कौन-सी जनजाति क्या करती है" या "किसका प्रमुख क्या कहलाता है" जैसे जोड़ी मिलाने वाले प्रश्न सबसे अधिक आते हैं।
जनजातियों के पारंपरिक कार्य
| जनजाति | परंपरागत कार्य |
|---|---|
| हल्बा | कृषि करते हैं तथा चिवड़ा (पोहा) बनाते हैं |
| मुड़िया | काष्ठ और लौह शिल्पकला |
| अबूझमाड़िया | काष्ठ शिल्प |
| गदबा | घरेलू कार्य |
| परजा | पशुपालन एवं बांस शिल्पकला |
| भतरा | सेवा कार्य करते हैं |
| धुरवा | मुख्यतः कृषि पर निर्भर; केन (गन्ना) से निर्मित वस्तुओं का विक्रय |
| ओझा गोंड | गोदना गोदने का कार्य |
| बैगा | बीमारी और बाधा का जड़ी-बूटी, तंत्र-मंत्र से उपचार |
| अगरिया | लौह शिल्पकला (अयस्क को गलाकर लोहा तैयार करते हैं) |
| परधान | गाथा गायन / संगीत कार्य |
| कमार | बांस शिल्पकला तथा टोकरी निर्माण |
| कंडरा | बाँस का बर्तन बनाना |
| भुंजिया | तप्त लोहे से इलाज के लिए प्रसिद्ध |
| शिकारी | छिंद पत्ते से चटाई, टोकरी एवं झाड़ू बनाना |
| संवरा | साँप पकड़ना |
| धनवार | बाँस शिल्पकला |
| कंवर | सैन्य कार्य करते हैं |
| बिरहोर | बाँस शिल्पकला (बाँस का बर्तन) तथा रस्सी निर्माण |
| खड़िया | पालकी ढोने का कार्य |
| कोरकू | भूमि खोदने (Land Excavation) का कार्य |
| खैरवार | कत्था निकालने का कार्य |
| पारधी | काले रंग के पक्षी का शिकार |
| कोल | कोयला खोदने का कार्य |
| पंडोप | कांस्य शिल्प एवं कृषि कार्य |
| मलार | चिमनी निर्माण (धातु शिल्प); सरगुजा में प्रचलित |
ध्यान दें कि तालिका में "पंडोप" शब्द छपा है। संभवतः यह पण्डो जनजाति की ओर संकेत है, पर स्रोत का शब्द जैसा है वैसा ही यहाँ रखा गया है।
जनजाति शिल्प (बाँस, छिंद पत्ते आदि)
| शिल्प | जनजाति |
|---|---|
| बाँस शिल्प कार्य में निपुण / टोकरी निर्माण | कमार |
| बाँस शिल्प कार्य आजीविका प्रधान / जीवनयापन का स्रोत | कमार |
| बाँस के बर्तन निर्माण में निपुण | कमार, कंडरा, धनवार, बिरहोर |
| बाँस शिल्पकला | सौंता, बैगा, माँझी, दोरला, परजा |
| काष्ठ शिल्प | अबूझमाड़िया, मुड़िया |
| छिंद पत्ता शिल्प | शिकारी, पारधी |
| मोहलाइन छाल व उरई से रस्सी | बिरहोर, खोण्ड |
बाँस शिल्प के मामले में कमार सबसे आगे बताए गए हैं: स्रोत में दो अलग पंक्तियाँ केवल कमार के लिए हैं, एक में निपुणता और दूसरी में मुख्य आजीविका।
जनजातियों के पंचायत प्रमुख
जाति पंचायत के प्रमुख का नाम हर जनजाति में अलग होता है। तालिका पूरी दी गई है:
| जनजाति | जाति पंचायत का प्रमुख |
|---|---|
| परजा | मड़ूली |
| गोंड, कण्डरा | राजा / भोई |
| बियार, नगेशिया, कमार | मुखिया |
| उरांव | महतो |
| माझी | माझी |
| खैरवार | महतो माँझी |
| खड़िया | परधान |
| मुण्डा | परहाराजा |
| धनवार | धनिया |
| बिंझवार, मंझवार | गौंटिया |
| अगरिया | गौंटिया |
| कोल | गोहिया / गोतिया |
| मुरिया | पटेल |
| अबूझमाड़िया | माँझी |
| बिरहोर | मालिक |
| बैगा | पटेल |
| कोरवा | टोलादार / मुखिया |
| कमार | कुरहा |
| पण्डो | मुखिया |
| भुंजिया | पुजेरी / पाती |
ध्यान रहे कि "कमार" तालिका में दो बार आता है: एक बार "बियार, नगेशिया, कमार" के साथ मुखिया, और दूसरी बार अकेले कुरहा। स्रोत में यह दोहराव है, इसलिए परीक्षा में विकल्पों में जो शब्द दिया हो उसे देखें। बैगा और मुरिया दोनों के प्रमुख को पटेल कहा गया है। बिंझवार-मंझवार और अगरिया दोनों के प्रमुख गौंटिया हैं।
रसोईघर के नाम और निवास स्थान
| जनजाति | रसोईघर का नाम |
|---|---|
| भुंजिया | लाल बंगला |
| अबूझमाड़िया | अंगादी |
| पारधी | माईघर |
| बैगा | रांधड़ घर |
| माड़िया | राधा लोना |
| दोरला | ओजल |
| जनजाति | निवास स्थान |
|---|---|
| माड़िया | वेंडुकुरमा |
| दोरला | दोरभूम |
| कोरकू | ढाना |
| भारिया | ढाना |
| बिरहोर | टांडा |
भुंजिया का रसोईघर "लाल बंगला" सबसे अधिक पूछा गया नाम है। कोरकू और भारिया, दोनों की बस्ती को ढाना कहा गया है।
जनजातियों से संबंधित पुस्तकें एवं लेखक
| लेखक | संबंधित पुस्तक |
|---|---|
| वेरियर एल्विन (Verrier Elwin) | द मुड़िया एण्ड देयर घोटुल (1947); द गौर; द अगरिया; द बैगा; Maria Murder and Suicide; A New Deal for Tribal India |
| एस.सी. रॉय (शरदचंद्र राय) | द बिरहोर |
| श्यामाचरण दुबे (S.C. दुबे) | द कमार |
| जार्ज विलफ्रिड ग्रिगसन | द माड़िया गोन्ड्स ऑफ बस्तर |
| टी.बी. नायक | द भील: एक अध्ययन; द अबूझमारियास (1963); बारह भाई बिंझवार |
| दयाशंकर नाग | द ट्राईबल इकोनामी (बैगाओं पर) |
| श्याम राव | द परधान |
| डब्ल्यू.जी. ग्रिफिथ | द कोल ट्राइब ऑफ सेंट्रल इंडिया |
| एल.पी. विद्यार्थी | भारतीय आदिवासी: उनकी संस्कृति एवं सामाजिक पृष्ठभूमि |
| बी.एच. मेहता | गोंड्स ऑफ द सेंट्रल इंडियन हाईलैण्ड्स |
| डी. हाजरा | द दोरला ऑफ बस्तर |
"द मुड़िया एण्ड देयर घोटुल" के लेखक वेरियर एल्विन हैं और यह पुस्तक 1947 की बताई गई है। तालिका में पुस्तक का नाम अंग्रेज़ी में "The Muriya and their Ghotul" भी छपा है, यानी मुड़िया और मुरिया एक ही समूह के दो उच्चारण हैं।
जनजातियों के पेय पदार्थ
| पेय पदार्थ | जनजाति / स्रोत |
|---|---|
| सल्फी | मुड़िया, माड़िया (सल्फी वृक्ष से) |
| ताड़ी | बैगा (ताड़ वृक्ष और छिन्द वृक्ष से) |
| हाँड़िया | कोरवा (गोंदली, कुटकी और बाजरे के अनाज से) |
| छिंदरस | माड़िया एवं अबूझमाड़िया (छिन्द वृक्ष से) |
| पेज | गोंड (चावल से बनता है) |
| कोसमा | उराँव (कोसम बीज व पके चावल (बासी) से) |
| दाडना | मुड़िया (महुए से निर्मित) |
| लान्दा | बस्तर में चावल से निर्मित पेय; गोटुल में |
| चार | चावल से बना किण्वित पेय; त्यौहारों और विवाह में पिया जाता है; बस्तर में लोकप्रिय |
गोदना (Tattoo)
गोदना जनजातीय शरीर-सज्जा की परंपरा है। स्रोत के अनुसार गोदना शिल्पकार कुंजर, बंजारा, देवार, बादी जाति और ओझा (गोंड) हैं। बैगा जनजाति को गोदना प्रिय जनजाति बताया गया है। सबसे अधिक गोदना गोदवाने वाली जनजाति कमार है।
- बैगा महिलाएँ "झेला गोदना" अपने शरीर पर बनवाती हैं, माथे में गोदना गोदवाती हैं और हाथ-पैर व चेहरे पर बादी जाति की महिलाओं से गोदना करवाती हैं।
- कमार स्त्रियाँ कन्धों पर मोर की आकृति गोदवाती हैं।
- अनुसूचित जाति "देवार" भी गोदना गोदने का कार्य करती है।
- सरगुजा जिले के लखनपुर ब्लॉक का जामगला गाँव अपनी महिलाओं की गोदना कला के लिए प्रसिद्ध है।
- गोदना शिल्प का प्रचलन सरगुजा एवं जशपुर जिले में है।
- बिंझवार जनजाति में प्रचलित गोदना को "झूंठी" कहा जाता है।
- गोदना शिल्प प्रशिक्षण केन्द्र का शुभारंभ 9 सितम्बर 2023 को गरियाबंद में हुआ।
स्थानांतरित कृषि
जनजातियाँ जिस खेती में स्थान बदल-बदलकर बीज बोती हैं, उसे स्थानांतरित कृषि कहते हैं। उत्तर-पूर्व भारत में इसे झूम कृषि कहते हैं और स्थानीय भाषा में दिप्पी कृषि या पेण्ड्रा कृषि कहा जाता है। अलग-अलग जनजाति में इसका नाम अलग है:
| जनजाति | स्थानांतरित कृषि |
|---|---|
| बैगा व पण्डो | बेवरा / बेवार (Bewar) |
| गोंड | धारिया या बेवार |
| भतरा | दहिया |
| कमार | दाहिया (Dahiya) |
| कोरवा | देवारी |
| अबूझमाड़िया | पेद्दा (Pedda) |
| माड़िया | पेद्दा (Pedda) |
| भारिया | बेवर |
विशेष: कोंध जनजाति द्वारा पोडु खेती की जाती है। ध्यान दें कि भतरा (दहिया) और कमार (दाहिया) के नाम मिलते-जुलते हैं, और बैगा-पण्डो तथा भारिया तीनों बेवर से जुड़े हैं।
तुलना एवं संबंध
| जनजाति | कार्य | पंचायत प्रमुख | कृषि / पेय |
|---|---|---|---|
| बैगा | जड़ी-बूटी से उपचार | पटेल | बेवर; ताड़ी |
| कमार | बाँस, टोकरी | कुरहा / मुखिया | दाहिया |
| अबूझमाड़िया | काष्ठ शिल्प | माँझी | पेद्दा; छिंदरस |
| मुड़िया | काष्ठ, लौह शिल्प | (मुरिया: पटेल) | सल्फी, दाडना |
| कोरवा | — | टोलादार / मुखिया | देवारी; हाँड़िया |
| भुंजिया | तप्त लोहे से इलाज | पुजेरी / पाती | रसोईघर: लाल बंगला |
| शिल्प | जनजातियाँ |
|---|---|
| बाँस | कमार, कंडरा, धनवार, बिरहोर, सौंता, बैगा, माँझी, दोरला, परजा |
| काष्ठ | अबूझमाड़िया, मुड़िया |
| छिंद पत्ता | शिकारी, पारधी |
| लौह | अगरिया, मुड़िया, भुंजिया (इलाज) |
याद रखने योग्य बिंदु
- अगरिया लौह शिल्प में अयस्क को गलाकर लोहा बनाते हैं।
- कोरकू भूमि खोदने, खैरवार कत्था और कोल कोयला निकालने का कार्य करते हैं।
- हल्बा कृषि करते हैं तथा चिवड़ा बनाते हैं।
- कंवर सैन्य कार्य करते हैं।
- भतरा सेवा कार्य करते हैं।
- खड़िया पालकी ढोते हैं; संवरा साँप पकड़ते हैं।
- मुखिया के नाम: परजा-मड़ूली, गोंड-राजा/भोई, उरांव-महतो, मुण्डा-परहाराजा।
- भुंजिया रसोईघर लाल बंगला; बैगा रसोईघर रांधड़ घर।
- सल्फी मुड़िया-माड़िया; ताड़ी बैगा; हाँड़िया कोरवा; दाडना मुड़िया।
- बैगा और पण्डो की स्थानांतरित कृषि बेवर; अबूझमाड़िया-माड़िया की पेद्दा।
- वेरियर एल्विन: द मुड़िया एण्ड देयर घोटुल (1947), द बैगा, द अगरिया।
- सर्वाधिक गोदना कमार गोदवाते हैं; गोदना प्रिय बैगा।
- बिंझवार गोदना = झूंठी।
- कोंध पोडु खेती करते हैं।
स्मरण सूत्र
- "अगर लोहा, कोर खोदे, खै कत्था, कोल कोयला": अगरिया-लोहा, कोरकू-खुदाई, खैरवार-कत्था, कोल-कोयला।
- "बैगा-पण्डो बे-वर": दोनों की खेती बेवर।
- "कमार कुरहा, बैगा पटेल": मुखिया का नाम।
परीक्षा में कैसे पूछा जाता है
पूल में इस विषय से सबसे अधिक "जनजाति और उसका कार्य" या "जनजाति और उसकी विशेष कृषि" की जोड़ियाँ आती हैं। जैसे लोहे के औज़ार बनाने वाली जनजाति (अगरिया), बेवर कृषि (बैगा), कंवर और कौरवों का संबंध, मुरिया घोटुल और उसके अध्येता वेरियर एल्विन। पंचायत प्रमुख और रसोईघर के नामों पर पूछे गए प्रश्न जोड़ी-मिलान की शक्ल में आते हैं।
स्वयं जाँचें
- प्रश्न: कमार की स्थानांतरित कृषि किस नाम से जानी जाती है? उत्तर: दाहिया (Dahiya)।
- प्रश्न: भुंजिया के रसोईघर को क्या कहते हैं? उत्तर: लाल बंगला।
- प्रश्न: द बिरहोर पुस्तक किसने लिखी? उत्तर: एस.सी. रॉय।
- प्रश्न: हाँड़िया पेय किसके यहाँ बनता है? उत्तर: कोरवा (गोंदली, कुटकी और बाजरे से)।
- प्रश्न: झेला गोदना कौन बनवाती हैं? उत्तर: बैगा महिलाएँ।
अभ्यास प्रश्न
निम्नलिखित में से लोहे के उपकरण बनाने वाली इस राज्य की जनजाति कौन-सी है?
- (A) कोल
- (B) सहरिया
- (C) अगरिया
- (D) पारधी
बेवर कृषि किस जनजाति द्वारा की जाती है?
- (A) बैगा
- (B) मुण्डा
- (C) उराँव
- (D) संथाल
किस समाजविज्ञानी ने इस छत्तीसगढ़ राज्य की ‘‘मूरिया‘‘ जनजाति में प्रचलित ‘‘घोटुल‘‘ प्रथा का गहन अध्ययन किया है ?
- (A) वेरियर एल्विन
- (B) श्यामाचरण दुबे
- (C) जी.एस. धुर्ये
- (D) इरावती कर्वे
हल्बा जनजाति का मुख्य जीविकोपार्जन है–
- (A) कृषि
- (B) आखेट
- (C) देवपूजा
- (D) मजदूरी
उत्तरमाला एवं व्याख्या
- (C) - अगरिया अयस्क गलाकर लोहा बनाते हैं (लौह शिल्प)।
- (A) - बैगा और पण्डो की स्थानांतरित कृषि बेवर/बेवरा है।
- (A) - "द मुड़िया एण्ड देयर घोटुल" (1947) वेरियर एल्विन की पुस्तक है।
- (A) - हल्बा कृषि करते हैं तथा चिवड़ा बनाते हैं।