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छत्तीसगढ़ की जनजातियाँ — सम्पूर्ण अध्ययन · Chapter 16
मड़ई, मेला एवं लोक शिल्पकला

मड़ई, मेला एवं लोक शिल्पकला

बस्तर की मड़ई (विशेषकर फाल्गुन मड़ई) जनजातीय सामाजिक-आर्थिक जीवन का बड़ा मेला है। दूसरे भाग में छत्तीसगढ़ की लोक शिल्पकला (मिट्टी, धातु, बाँस, काष्ठ और छिन्दपत्ता) का वर्गीकरण, क्षेत्र, शिल्पकार और मिश्र धातुओं का संघटन है। परीक्षा में मड़ई के स्थान, फाल्गुन मड़ई के दिन-क्रम, घड़वा/झारा के क्षेत्र और शिल्पकारों के नाम बार-बार पूछे जाते हैं।

मड़ई, मेला एवं पर्व

  • शुरुआत: पुरूषोत्तम देव (बस्तर काकतीय वंश के राजा)।
  • क्षेत्र: बस्तर संभाग; जनजाति: माड़िया और मुड़िया।
  • अवसर: फसल कटने के बाद (माघ से फाल्गुन तक)।
  • आराध्य देव: अंगादेव (काष्ठ से निर्मित) की पूजा हेतु।
  • मड़ई के समय मुड़िया जनजाति द्वारा एबालतोर नृत्य किया जाता है।
  • सर्वप्रसिद्ध मड़ई: नारायणपुर की मड़ई (फरवरी माह में आयोजित); मड़ई का घर: बस्तर संभाग।
  • उद्देश्य: सांस्कृतिक क्रियाएँ, अर्थव्यवस्था और जीवनसाथी का चयन।

प्रदेश की प्रमुख मड़ई (जिलेवार)

जिलानाम
नारायणपुरमड़ई (विश्व प्रसिद्ध), मावली मड़ई
कोंडागाँवफाल्गुन मड़ई
दंतेवाड़ाफाल्गुन मड़ई, घोटपाल मड़ई
कांकेरमाघ मड़ई
दंतेवाड़ा (बस्तर संभाग)दंतेश्वरी फाल्गुन मड़ई (9 दिनों तक चलती है)
राजनांदगाँवलोक मड़ई

फाल्गुन मड़ई (दंतेवाड़ा)

  • अवधि: 45 दिन; मुख्य आयोजन: 13 दिन; देवी पूजन: 9 दिन।
  • माह: बसंत पंचमी से चैत्र कृष्ण पक्ष चतुर्थी तक।
  • महत्व: बस्तर दशहरा के बाद दूसरा प्रमुख पर्व।
  • बसंत पंचमी: इस दिन त्रिशूल स्थापना; आमा मउर तिहार का आयोजन, देवी-देवताओं को आम का मौर चढ़ाया जाता है।
तिथिकार्यक्रम
फाल्गुन शुक्ल सप्तमीकलश स्थापना एवं पालकी विधान
अष्टमीताड़ पलंगा धोनी कार्यक्रम
नवमीखोर खुंदनी रस्म
दशमीनाच माँडनी कार्यक्रम
एकादशीलम्हामार (आखेट)
द्वादशीकोटरीमार
त्रयोदशीचितलमार
चतुर्दशीगंवरमार
पूर्णिमाआँवरामार, होलिका दहन
चैत्र कृष्ण प्रतिपदारंग-बंग, पादुका पूजन कार्यक्रम
द्वितीयाविश्राम
तृतीयामेला मड़ई
चतुर्थीदेवी-देवताओं की विदाई रस्म

लोक शिल्पकला का वर्गीकरण

शिल्पक्षेत्र / जातिशिल्पकार / विवरण
मिट्टी शिल्प (सरगुजा)रजवार भित्तिशिल्पघरों की दीवारों में विभिन्न निरूपण; शिल्पकार सोनाबाई रजवार
मिट्टी शिल्प (बस्तर)-शिल्पकार: क्षितरूराम, देवनाथ, शम्भू, चन्दन सिंह, वृन्दावन, जगदेव, सहदेव, रोशनलाल
धातु शिल्प - घड़वा/ढोकराबस्तर क्षेत्र, कसेर जातिकांसा+पीतल+रांगा; भ्रष्ट मोम पद्धति; जयदेव बघेल, मानिकराम घड़वा, सुखचंद, पदुम
धातु शिल्प - बेलधातु/झारारायगढ़ क्षेत्र, झारा जातिपीतल+कांसा; भ्रष्ट मोम पद्धति; गोविंदराम झारा, रामलाल झारा
धातु शिल्प - लोहाअगरिया जनजाति + लोहार जाति-
बाँस शिल्पबर्तन, टुकनी एवं अन्यकमार, कंडरा, धनवार, बिरहोर, सौंता, बैगा, माँझी, दोरला
काष्ठ शिल्पबंजारा समुदायकौड़ी शिल्पकला
छिन्दपत्ता शिल्पशिकारी जनजाति, पारधी जनजातिचटाई + झाडू + टोकरी

धातु शिल्पकला

धातुकला का कार्य जनजातियों द्वारा आदिकाल से किया जा रहा है। वर्तमान में बस्तर, सरगुजा एवं रायगढ़ में इस कला की विशेष पहचान है, जिसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है: बस्तर में घड़वा, रायगढ़ में झारा धातुकला, सरगुजा में मलार, कसेर, भरेवा। राष्ट्रीय स्तर पर धातु शिल्पकला को बेलमेटल शिल्पकला के नाम से जाना जाता है।

घड़वा / ढोकरा शिल्पकला

  • अर्थ: गढ़ना (निपुणता)। क्षेत्र: बस्तर, कोण्डागाँव; शिल्पग्राम: कोण्डागाँव।
  • नामकरण: घड़वा स्थानीय स्तर पर पारंपरिक शिल्पी के कारण; ढोकरा प्रशासनिक स्तर पर प्रयुक्त शब्दावली।
  • शिल्पकार: जयदेव बघेल (शिल्पगुरु), मानिकराम घड़वा, सुखचंद प्रसाद, पदुमलाल।
  • प्रयुक्त सामग्री: पीतल, कांसा एवं रांगा (टिन); पद्धति: भ्रष्ट मोम पद्धति; कांस्य मूर्ति का निर्माण होता है।

झारा शिल्पकला (बेल मेटल हस्तशिल्प)

  • शिल्प केन्द्र: एकताल (रायगढ़)।
  • शिल्पकार: गोविन्दराम झारा, रामलाल झारा, बुधियारिन देवी।
  • प्रयुक्त सामग्री: पीतल, कांसा।

लौह शिल्पकला

  • क्षेत्र: मैकल पर्वत श्रृंखला एवं बस्तर क्षेत्र।
  • जनजाति: अगरिया, लोहार; सामग्री: लोहा।
  • निर्माण: देवी-देवता, पशु-पक्षी एवं सजावटी वस्तुएँ।

मिश्र धातु संघटन

मिश्र धातुसंघटन
पीतलCu (80%) + Zn (20%)
कांसाCu (88%) + Sn (12%)
बेलमेटलCu (75%) + Sn (25%)

तुलना एवं संबंध

कलाक्षेत्रजाति/जनजातिसामग्री
घड़वा/ढोकराबस्तर, कोण्डागाँवकसेरकांसा, पीतल, रांगा
झारारायगढ़ (एकताल)झारापीतल, कांसा
मलार, कसेर, भरेवासरगुजा--
लौहमैकल श्रेणी, बस्तरअगरिया, लोहारलोहा
मड़ईजिला
विश्व प्रसिद्धनारायणपुर
माघ मड़ईकांकेर
घोटपाल मड़ईदंतेवाड़ा
लोक मड़ईराजनांदगाँव

विसंगति: पृष्ठ 400 में मड़ई का समय माघ से फाल्गुन बताया गया है, जबकि नारायणपुर की मड़ई फरवरी में बताई गई है। दंतेवाड़ा की फाल्गुन मड़ई को पृष्ठ 401 में एक स्थान पर 9 दिन और दूसरे विवरण में 45 दिन की (13 दिन मुख्य, 9 दिन देवी पूजन) बताया गया है; परीक्षा में पूछे जाने पर प्रश्न का संदर्भ देखें।

याद रखने योग्य बिंदु

  • मड़ई की शुरुआत पुरूषोत्तम देव ने की (काकतीय वंश)।
  • मड़ई माड़िया और मुड़िया में; अंगादेव की पूजा।
  • सर्वप्रसिद्ध मड़ई नारायणपुर की (फरवरी)।
  • कांकेर - माघ मड़ई; कोंडागाँव - फाल्गुन मड़ई; राजनांदगाँव - लोक मड़ई।
  • फाल्गुन मड़ई: 45 दिन, 13 दिन मुख्य, 9 दिन देवी पूजन।
  • फाल्गुन मड़ई बस्तर दशहरा के बाद दूसरा प्रमुख पर्व।
  • पूर्णिमा को आँवरामार और होलिका दहन।
  • घड़वा = बस्तर, झारा = रायगढ़, मलार/कसेर/भरेवा = सरगुजा।
  • ढोकरा प्रशासनिक शब्द; घड़वा स्थानीय।
  • भ्रष्ट मोम पद्धति घड़वा और झारा दोनों में।
  • जयदेव बघेल को शिल्पगुरु कहा गया है।
  • झारा का केन्द्र एकताल (रायगढ़)।
  • पीतल Cu80+Zn20; कांसा Cu88+Sn12; बेलमेटल Cu75+Sn25।
  • बाँस शिल्प में कमार, कंडरा, धनवार, बिरहोर, सौंता, बैगा, माँझी, दोरला।

स्मरण सूत्र

  • "घ-ब, झा-रा, म-स" = घड़वा-बस्तर, झारा-रायगढ़, मलार-सरगुजा।
  • "पीतल 8:2, कांसा 88:12, बेल 75:25" = तीनों मिश्रधातुओं के अनुपात।
  • "आँवरामार पूर्णिमा" = मड़ई के अंत में आँवरामार और होली।

परीक्षा में कैसे पूछा जाता है

मड़ई के स्थान (नारायणपुर) और उद्देश्य (सांस्कृतिक क्रिया, अर्थव्यवस्था, जीवनसाथी का चयन) पूछे जाते हैं।

शिल्प के प्रश्न क्षेत्र-नाम मिलान (घड़वा-बस्तर, झारा-रायगढ़) और शिल्पकारों के नाम पर आते हैं।

शिल्पकार नाम वाले प्रश्नों में जो नाम पुस्तक की सूची में न हो, उसे गलत विकल्प मानने के लिए पहले पूरी सूची से मिलान करें।

पूल के प्रश्नों में मड़ई का स्थान और धातु शिल्पकार पहचानने वाले प्रश्न मिले।

स्वयं जाँचें

  1. घड़वा कला किस क्षेत्र की है? बस्तर (कोण्डागाँव)।
  2. झारा शिल्प का केन्द्र? एकताल, रायगढ़।
  3. फाल्गुन मड़ई में देवी पूजन कितने दिन? 9 दिन।
  4. कांसे में तांबा और टिन का प्रतिशत? Cu 88% + Sn 12%।
  5. मड़ई का उद्देश्य क्या-क्या? सांस्कृतिक क्रियाएँ, अर्थव्यवस्था, जीवनसाथी का चयन।

अभ्यास प्रश्न

  1. निम्न में से किस स्थान की मड़ई प्रसिद्ध हैं ?

    • (A) नारायणपुर
    • (B) जगदलपुर
    • (C) कांकेर
    • (D) चारामा

उत्तरमाला एवं व्याख्या

  1. (A) - पुस्तक में नारायणपुर की मड़ई को सर्वप्रसिद्ध (विश्व प्रसिद्ध) बताया गया है।
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